
दीपावली से एक दिन पहले पूरे शहर में उत्साह का माहौल था। गलियों में रंगोली के रंग बिखरे थे, घर-घर में दीये सजे थे और मिठाइयों की मीठी सुगंध हवा में घुली थी। हर तरफ रोशनी और हर्षोल्लास झिलमिला रहा था।
निकिता के विशाल बंगले में भी तैयारी जोरों पर थी। ड्राइंग रूम में सजावट चल रही थी, किचन में तरह-तरह के पकवान बन रहे थे और नौकर-नौकरानियों की आवाजाही से घर गूँज रहा था।
इसी घर में रेखा पिछले पाँच सालों से झाड़ू–पोछा और सफाई का काम करती थी। वह एक परिश्रमी और सहनशील स्त्री थी, जिसने पति के देहांत के बाद अपने बेटे रानू को अपनी मेहनत से पाला। आज भी वह तड़के से काम में जुटी थी, और उसका नन्हा बेटा रानू उसके साथ आया था।
किचन से आती पूरियों और हलवे की खुशबू ने रानू का छोटा-सा पेट जैसे विद्रोह कर दिया। वह मां के पास जाकर आँचल पकड़ते हुए बोला —
“मां… जल्दी घर चलो ना… बहुत भूख लगी है। मुझे रोटी-दाल चाहिए… या फिर पूरी ही दे दो।”
रेखा ने उसकी मासूम आँखों में भूख और इंतज़ार देखा, लेकिन मन ही मन वह जानती थी — “अगर अभी काम छोड़ा, तो कल की मजदूरी पर असर पड़ेगा।” उसने बेटे को शांत करने की कोशिश की।
उसी समय निकिता किचन से निकली। महँगे रेशमी सूट और गहनों से सजी वह हाथ में एक बिस्कुट का पैकेट लिए रानू के पास आई और रूखे स्वर में बोली —
“लो, इसे खा लो और बाहर जाकर खेलो… यहाँ मत खड़े रहो।”
रानू ने पैकेट को देखा, पर उसकी आँखों में चमक नहीं आई। वह जानता था, बिस्कुट उसके पेट की आग नहीं बुझा सकते।
निकिता को उसकी उपस्थिति अखरने लगी। उसने ज़ोर से पुकारा —
“रेखा! इधर आओ ज़रा… पहले ड्राइंग रूम की सफाई कर दो, बाकी बाद में करना।”
“जी मालकिन, अभी आती हूँ,” रेखा बोली और झुककर काम में लग गई।
उधर रानू अब खुद को रोक न सका। वह फूट पड़ा —
“मां… मुझे बिस्कुट नहीं खाना… मुझे रोटी-दाल चाहिए… घर चलो ना।”
निकिता झुंझलाकर बोली —
“तुम्हें समझ में नहीं आता? मैंने बिस्कुट दिया है, खाओ और बाहर जाओ। तुम्हारी मां को बहुत काम करना है।”
तभी रानू की मासूम आँखों में एक अजीब-सी दृढ़ता झलक उठी। वह गुस्से से बोला —
“आंटी… आप अपना काम खुद क्यों नहीं करतीं? मेरी मां को क्यों परेशान करती हो?”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। नौकरानियाँ चुपचाप एक-दूसरे को देखने लगीं। निकिता कुछ पल के लिए ठिठक गई। किसी ने उससे इस लहजे में कभी बात नहीं की थी, पर रानू की बात में सच्चाई की चुभन थी।
इसी बीच निकिता की सास — दादीजी — वहाँ आ गईं। सफेद साड़ी में लिपटी, चेहरे पर अपनापन और आँखों में गहराई लिए उन्होंने सारी बात सुन ली थी।
उन्होंने रानू को अपने पास बुलाया, उसके सिर पर हाथ फेरा और स्नेह से बोलीं —
“बेटा… भूख लगी है ना? चलो मेरे साथ।”
वे उसे रसोई में ले गईं, एक साफ़ प्लेट में गरमागरम पूरी सब्जी और थोड़ा-सा हलवा परोसा। रानू की आँखें चमक उठीं। उसने आदर से हाथ जोड़कर कहा —
“धन्यवाद दादीजी।”
और फिर वह चुपचाप खाने बैठ गया।
दादीजी ने निकिता की ओर देखते हुए शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहा —
“बेटा, दीपावली केवल घर को सजाने का पर्व नहीं है। यह हृदय को रोशनी से भरने का उत्सव है। जो बच्चे भूख में भी सच्चाई से बोलते हैं, उन्हें डाँटना नहीं, अपनापन देना चाहिए।”
निकिता का सिर झुक गया। पहली बार उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।
शाम को जब दीपावली की पूजा शुरू हुई, तो दादीजी ने रेखा और रानू को भी कहा की वह पूजा करके हमारे यहां भी दीपावली का आनंद लेने आए।। ताकि हर घर में दीपक जल सके। लेकिन प्रसाद की मिठाई हमारे साथ ही खाना पड़ेगा । यह पहली बार था जब किसी नौकरानी और उसके बच्चेको सबके साथ दीपावली के पटाखे चलाने का आनंद मिला।।
दीयों की पंक्तियों में रेखा की आँखों से कृतज्ञता के आँसू चमक उठे। रानू भी अपनी नन्ही हथेलियों में जलता दीपक थामे मुस्कुरा रहा था।
निकिता आगे बढ़ी, रेखा से बोली —
“मुझे माफ़ कर दो रेखा… और रानू… तुम बहुत हिम्मती हो।”
फिर उसने रानू को मिठाइयों का एक डिब्बा दिया और कहा —
“आज से इस घर में त्योहार सबके लिए होगा… सिर्फ़ हमारे लिए नहीं।”
उस रात दीपावली के दीये केवल आँगन में ही नहीं, दिलों में भी जल उठे।
“सच्ची दीपावली वही है, जब किसी के दिल में उजाला पहुँचे। दीये तभी पूर्ण होते हैं जब उनके साथ करुणा भी जलती है।”
पुष्पा पाठकछतरपुर मध्य प्रदेश












