
सुकून मिले जिंदगी को
थोड़ा आराम भी मिले।
मेरी शाम को ढलने से
पहले पहचान भी मिले।।
हालत है मेरे, जिस
हिसाब से,
उम्र को उम्मीद की
पनाह तो मिले।।
गजल लिख रश्क ,की ताख
में रख गया
पन्नों की राख को आवाज
तो मिले।।
ऊषा की किरण किराए
के आवास में रुक गई
जिस्म के बिखरे टुकड़ों
को श्मशान की खाक तो मिले।।
रूख मौसम फिजाओं
का बदलने लगा है शायद
तख्त की लड़ाई में भाई
को भाई से कुछ प्रेम तो मिले।।
तन्हा कट गया हूं और
भूल गया हूं खुद को
नुक्कड़ के मोड़ पे
लौट कर आता
नीर को नसीब तो मिले।।
डॉ नीरज आचार्य नीर













