
श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम ।
इतरेषाम्= दूसरे साधकों का {निरोधरूप योग} श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वकः= श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक {क्रम से} सिद्ध होता है ।
अनुवाद– विदेह और प्रकृतिलयों से भिन्न योगियों को श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा आदि उपायों से ‘असम्प्रज्ञात समाधि’ सिद्ध होती है ।
व्याख्या– उपर्युक्त सूत्र में ‘भव-प्रत्यय’ योग की स्थिति बताई गई है । किंतु भव-प्रत्यय योगियों के अलावा अन्य योगी उपाय-प्रत्यय से निर्बीज समाधि को उपलब्ध होते हैं ।
इन उपायों के क्रम में ‘श्रद्धा’ परम आवश्यक है । बिना श्रद्धा के योग साधना असम्भव है । भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है “श्रद्धावान मनुष्य ही ज्ञान को प्राप्त होता है” । गीता ४।३९
दूसरा साधन “वीर्य रक्षा” है । वीर्य रक्षण से मन इंद्रियाँ और शरीर सशक्त रहता है जो योग साधन में परम आवश्यक है । रुग्ण मन इंद्रिय एवं शरीर वाला व्यक्ति योग साधना नहीं कर सकता ।
शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए ही पहले आसनों का तथा मन को स्वस्थ्य रखने के लिए ही प्राणायामों का अभ्यास कराया जाता है ।
इंद्रियों के स्वस्थ्य के लिए ध्यान मुख्य है । इन तीनों में वीर्यरक्षण सर्वोपरि महत्व रखता है। तीसरा साधन स्मृति है जो श्रद्धा और वीर्य रक्षण से बलवती होती है ।
इनके फलस्वरूप योगी को समाधि लाभ है होता है तथा समाधि में ही आत्मज्ञान होता है । समाधि की स्थिति में ही साधक का अंतःकरण शुद्ध होता है जिससे उसकी बुद्धि को सत्य ग्रहण करने वाली हो जाती है जिसे “ऋतंभरा” कहते हैं ।
इन साधनों से योगी को असम्प्रज्ञात समाधि का लाभ मिलता है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













