
परमप्राज्ञ की दृष्टि में, जग का हर रूप समान,
नहीं वहाँ कोई भेदभाव, न ऊँच-नीच, न मान।
परमप्राज्ञ के नेत्रों से, बहता शुद्ध ज्ञान,
सबमें एक ही चेतना, सबमें एक प्राण।
परमप्राज्ञ के शांति-सागर में, डूबा सारा ज्ञान,
लहरें मौन हो गईं, स्थिर हर एक प्राण।
परमप्राज्ञ का हृदय जहाँ, मिलता आत्म-विधान,
वहीं समरसता गूँजती, बनता ब्रह्म-समान।
परमप्राज्ञ का मौन स्वयं, बनता दिव्य प्रमाण,
वाणी रुक जाती वहाँ, जहाँ शून्य का गान।
परमप्राज्ञ के अंतर में, मिटता भ्रम और अज्ञान,
सत्य का दीपक जल उठे, बिन बाती, बिन तान।
परमप्राज्ञ की चेतना में, दीप्त हुआ हर प्राण,
जग का हर कण बोला -“मैं भी हूँ ब्रह्म-समान।”
परमप्राज्ञ के प्रेम में, मिटता अहं और अज्ञान,
जहाँ “मैं” और “तू” लय पाए, वही परम स्थान।
परमप्राज्ञ का सत्य है, जहाँ न द्वंद्व, न मान,
न कर्म, न संकल्प वहाँ, बस ब्रह्म का गान।
परमप्राज्ञ की अनुभूति में, मिटे सारा अज्ञान,
जीवन का हर क्षण बने, शांत तपो-विधान।
परमप्राज्ञ की शरण में, मिलता ब्रह्म-समान,
वहाँ थमता मन-तरंग, रमता केवल ज्ञान।
परमप्राज्ञ की दीप्ति से, निखरे सब अरमान,
यही मुक्ति का मार्ग है, यही जीवन-प्राण।
बहिष्प्राज्ञ की लहरों से, प्रारंभ हुआ गान,
इंद्रियों में जग देखता, बनता अनुभव-प्राण।
अंतःप्राज्ञ की गहराई में, जागा स्वप्न-ज्ञान,
परमप्राज्ञ तक पहुँचा मन, छोड़ समस्त भान।
स्थितिप्राज्ञ ने साध लिया, मन का स्थिर ध्यान,
महाप्राज्ञ ने जान लिया, सृष्टि का विधान।
सारे प्राज्ञ मिल जब गए, एक ही सत्य में जान,
परमप्राज्ञ में विलीन हुआ, सबका एक प्रमाण।
योगेश ग़हतोड़ी “यश”













