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कविता – बाजार और महंगाई

खूब सजा दिख रहा है आज बाजार,
अबकी बार तो, खूब रहेगा ये गुलजार‌।
देखो सभी ओर, लगी हुई है रेलम-पेल,
अरे! किसी ने तो मुझे ही दिया धकेल।

आगे आगे पत्नी, खुशियों से सराबोर,
नजरे हैं जिनकी, बाजार में चहुंओर।
साथ-साथ मैं भी बढ़ा जा रहा हूं,
जेब कटेगी, इस डर में चला जा रहा हूं।

पत्नी बोली ऐ जी, आगे देखो पटाखे सजे हैं,
इस बार तो बच्चों के, मजे ही मजे हैं।
जैसे ही पूछा दाम, मैं तो उछल पड़ा,
ऐसा लगा, मानो बम मुझ पर ही फट पड़ा।

मिठाई भी जैसे, मानो मुंह चिढ़ा रही है,
सच में खरीदो‌गे ? शायद यही कह रही है।
आगे और कपड़े का, बहुत बड़ा स्टॉल था,
वहां से निकलते, हो गया बुरा हाल था।

हर मध्यम वर्ग की, सच में यही कहानी है,
आज मेरी, तो कल किसी और की जुबानी है।
इस बढ़ती महंगाई में, बाजार तो बढ़ने लगा है,
पर आदमी अब त्योहारों से भी डरने लगा है।

प्रमोद सामंतराय
सरायपाली, महासमुंद (छ.ग.)

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