
शिवरीनारायण के घाट पे,
तीन नदियाँ मिल गए,
राम नाम गाती लहरें —कब राम मेरे घर आये
शबरी रोज जपती रहती,
बेर चुनती आस लगाए,
एक ही सपना मन में — कब राम मेरे घर आये।
खरौद वाली रेत पे बैठी,
प्रेम से दीप जलाती,
राम नाम लेकर रोती — कब प्रभु झोंपड़ी में आति।
एक दिन जंगल महक उठा,
पायल बजे हल्की-हल्की,
शबरी दौड़ी बाहर बोली — आये ना राम छलकती।
प्रभु ने हँसकर हाथ बढ़ाया,
शबरी चरणों में गिर गई,
बेरों वाली थाली लेकर — कहै प्रभु, ये लो, मैंने दई।
राम ने प्रेम से बेर खाए,
बोले — “भक्ति सबसे भारी”,
शबरी की आँखों में खुशी — जैसे खिल गइ कली न्यारी।
आज भी वही कहानी गूँजे,
शिवरीनारायण से खरौद तक,
सब गाते एक ही भजन — शबरी की राहों में राम तक।
रचनाकार – हरनारायण कुर्रे, मुड़पार चु, पोस्ट रसौटा, तहसील पामगढ़, जिला जांजगीर चांपा,छत्तीसगढ़













