
लिखता हूँ, मिटाता हूँ — रोज़ एक नई लकीर बनाता हूँ,
मेरे घर की टूटी दीवार को मैं रोज़ गिराता और फिर बनाता हूँ।
बाबूजी की बूढ़ी हड्डियों में अब जान नहीं रही,
और माँ के दिल में अब कोई अरमान नहीं रही।
अब मेरे माथे पर ही घर का सारा भार है,
कैसे चलेगा घर — यही रोज़ का विचार है।
अब कुछ भी करूँ, कहीं भी जाऊँ,
बाबूजी की फटकार अब नहीं पड़ती।
सदा लेटे रहते हैं खाट पर, कुछ बोलते भी नहीं,
उनका हाल देखा नहीं जाता — पर रो भी नहीं सकता।
माँ टूट जाएगी… इसीलिए आँसू भी रोक रखे हैं।
कुछ भी बोलता हूँ — बस देखते हैं,
अगर कुछ कहना हो — दो बूंद आँसुओं से कहते हैं।
मैं तो रोज़ काम करता हूँ, मार खाने वाला,
पर बाबूजी… देख कर भी नहीं देखते।
काश, एक बार फिर उठ जाते,
हमें डाट पाते, पीट पाते।
मैं भागता नहीं, मैं लड़ता भी नहीं,
बाबूजी जो कहते, मैं वही करता — बस पहले जैसे हो जाते।
माँ तो जैसे टूट सी गई हैं,
जैसे खुद से ही रूठ गई हों।
हम सब मिलकर उनके मन को बहलाते हैं,
पर पता नहीं क्यों… कुछ बोलती ही नहीं।
आर एस लॉस्टम













