
मुर्गा ने बोला कूकडूॅं कू ,
देखो हुआ मधुरिम भोर ।
पौ फटते चुचुहिया बोली ,
होत प्रात खग के शोर ।।
मधुरिम बेला मधुरिम राग ,
तरह तरह के छेड़े विहाग ।
प्रात भ्रमण बगीचा बाग ,
दिल भी होता बाग बाग ।।
चतुर्थ काक कर्कश स्वर ,
अश्व नींद से जगानेवाला ।
पंचम भास्कर हमें जगाए ,
चाहे कमरे लगे हों ताला ।।
बारी बारी से हमें जगाऍं ,
पंचम आ जगाए दिवाकर ।
जगने में ये आलस आए ,
चेहरे पे धूप दिखाए आकर ।।
किंतु बिन आंगन घर बनते ,
कमरे के खिड़की होते बंद ।
भेंडिलेटर से ही धूप बरसाते ,
सूर्यदेव भी होकर स्वछंद ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार













