Uncategorized
Trending

युद्ध-सा चल रहा है मन में

युद्ध-सा चल रहा है मन में,
जैसे आसमान बिखर रहा हो आसमान में।
न जाने, मैं जीतूंगा या हारूंगा —
ख़ुद से, हौसलों से, या हालात से।

मैं भीतर ही भीतर टूट रहा हूँ,
ख़ुद को पेबंद लगाकर गूँथ रहा हूँ,
जैसे मैं आदमी से इंसान बन रहा हूँ…
हाँ, शायद मैं इंसान बन रहा हूँ।

एक जंग-सी बिछड़ी है
अंदर ही अंदर —
बदलाव की गहराइयों में।

जिस्म और अंग दोनों फड़कने लगे हैं,
बदन से साँसें पिछड़ने लगी हैं।
जैसे धरती से अम्बर मिलने लगा हो,
जैसे नदियों की धाराएँ बदलने लगी हों।
राहें भी अब अपना रास्ता भटकने लगी हैं —
शायद कोई तूफ़ान भीतर उठने लगा है।

इसका कोई तो कारण ज़रूर होगा —
अनंत इच्छाओं का राजा ‘मन’
कहीं न कहीं द्वंद्व कर रहा है।

देखते हैं —
पार कराएगा बैतरणी,
या छोड़ देगा मझधार में।
( रूपेश सिंह लॉस्टम)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *