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दीपावली

अदृश्य माता लक्ष्मी घूम रही थी,

वहां उलूक था संग में।
बिजली की लडें लटक रही थी,
माता लक्ष्मी पता नहीं कि आस में भटक रही थी!!
उनके साथ चलते-चलते उलुक के पांव दुख गए।
” माता अनुमति हो तो तनिक
विश्राम करलें, मेरे पांव थक गए। “
पेड़ के नीचे विश्राम करते-करते माता बोली,
” मेरा मन बहुत दुखी है रे—“
” इतनी सुंदर सजावट हर तरफ,फिर भी आप दुखी? “
” हां बच्चे,देखो लड़े बिजली की
लटक रही है पर क्या सुंदरता दिख रही है?
वह माटी के तेल भरे दिए टिमटिमाते हैं
तो लगता है स्वर्ग के तारे उतर आते हैं।
ना वो दिए हैं,ना वह खूबसूरती है,ना पकवानों की खुशबू है,ना आत्मीयता की मुस्कान है।
एक दूसरे से दिखावे की होड़ है,
मन के भावों की कृत्रिमता बेजोड़ है।
कुम्हार उदास बैठे हैं,कैसी होगी दिवाली?
कैसे जलेंगे चूल्हे? बिना रोटी के खाली रहेगी थाली!!
पृथ्वी पर यह कैसी दिवाली??? “
सुलेखा चटर्जी

           क्षणिका
        

क्षणिका
समय पर सूर्य उदित होते हैं।
बादल और वर्षा सूर्य के रथ को
कहां रोक पाते हैं?
चलते चलते भास्कर देव
यही संदेश तो देते हैं,
कर्म करो, बाधाओ से ना डरो,
वह जैसे आते हैं,वैसे चले भी जाते हैं।
सुलेखा चटर्जी

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