
धरती की गोद में, मिट्टी का आलम,
जीवन की धड़कन, सृष्टि का संबलम।
सूरज की तपन, चाँदनी का आलिंगन,
किसान के सपनों का, ये अनघट चंदन।
हल की जुबान से, गीत गुनगुनाए,
पसीने की बूँदें, इसमें समाए।
बीजों को सींचे, ममता की छाया,
हर कण में बस्ता, उर्वरता का माया।
खेतों में लहरे, हरियाली की सैर,
गेहूँ, धान, सरसों, सजा फसलों का मेल।
मिट्टी की गोद में, उगता है जीवन,
इसकी महक में, बसता है यौवन।
सूखा सहे, या बाढ़ का प्रहार,
फिर भी न टूटे, मिट्टी का आधार।
कभी रूठे बादल, कभी जल की तृषा,
पर मिट्टी देती, हरदम बलिदान की कसम।
किसान का साथी, ये माटी प्यारी,
इसके बिना अधूरी, हर खेत की कियारी।
हे धरती माता, तुझ में समाया विश्व,
मिट्टी की रक्षा, हमारा है कर्तव्य।
रचनाकार -कौशल, मुड़पार चु ,पोस्ट रसौटा , तहसील पामगढ़, जिला जांजगीर चांपा, छत्तीसगढ़













