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समाधि पाद सूत्र–२३


   ईश्वर प्रणिधानाद्वा ।

वा= इसके सिवा; ईश्वरप्रणिधानात्= ईश्वर प्रणीधन से भी {निर्बीज-समाधि की सिद्धि शीघ्र हो सकती है} ।

अनुवाद– इसके सिवा ईश्वर भक्ति यानी शरणागति से निर्बीज समाधि की सिद्धि शीघ्र होती है ।

व्याख्या– दुनिया में दो प्रकार की साधनाएँ हैं स्वशक्ति साधना तथा पराशक्ति साधना । स्वशक्ति साधना में साधक अपनी ही शक्ति में विश्वास कर अपनी चेतना को जागृत करता है । स्व-चेतना अर्थात् आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर वह उसे विराट चेतन ब्रह्म से अपना एकत्व स्थापित कर अपनी समस्त वृत्तियों को प्रकृति में लय कर देता है जिससे उनका आरंभ हुआ था । पर शक्ति साधना में भक्ति मुख्य है । इसमें ईश्वर का मुख्य स्थान है । भक्त कहता है मनुष्य सेवक है वह कभी स्वामी नहीं हो सकता । जीव कभी ईश्वर नहीं हो सकता ।

स्व-शक्ति साधना में भी दो मुख्य दो हैं । योग तथा सांख्य ।
योग क्रिया द्वारा अपनी स्व-चेतना का ज्ञान करता है तथा सांख्य क्रिया मात्र बन्धन मानता है । वह अक्रिया का मार्ग बताता है ।
पतंजलि यहां योग की बात कर रहे हैं ।
मार्ग और भी हैं जिनसे पहुंचा जा सकता है किन्तु कोई योग मार्ग पर ही चलना चाहे तो पतंजलि योग दर्शन पूर्ण विज्ञान है ।

इसके नियमों एवं विधियों का पालन कर वह पहुँच सकता है । यह मार्ग निरापद है । योगी के लिए आत्मा से भिन्न कोई ईश्वर नहीं है तथा इसे वह चित्त वृत्तियों के निरोध द्वारा जान सकता है । उस आत्मा {पुरुष} को जान लेना तथा उसमें अपनी अस्मिता को लय कर देना ही मोक्ष या कैवल्य है जो जीव की सर्वोपरि स्थिति है ।
प्रत्येक व्यक्ति के भीतर जो छिपी चेतना है, वह ईश्वर ही है इसलिए अपनी चेतना के ज्ञान से हर व्यक्ति ‘ईश्वर’ है तथा प्रकृति के संयोग के कारण वह ‘जीव’ कहलाता है । संख्या भी पुरुष एवं प्रकृति को ही मानता है । जीव ही अन्त में उसे गुप्त चेतना को प्राप्त कर ईश्वर हो जाता है ।
अर्थात् मनुष्य का पूर्ण रूप से मिलाप ही ईश्वरत्व है । इसलिए योगी ही अंत में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ कहता है । भक्त ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि वे ईश्वर को जीव से भिन्न मानते हैं ।
किंतु पतंजलि योग साधना में भी ईश्वर शरणागति को महत्वपूर्ण मानते हैं । इन्होंने सूत्र २३ से २९ तक ईश्वर शरणागति, तथा उसका स्वरूप आदि का वर्णन करते हुए बताया है कि, इसका प्रयोग करने पर शीघ्र समाधि लाभ प्राप्त होता है। पतंजलि की दृष्टि में ईश्वर भी एक साधन है शंकराचार्य ने भी ईश्वर को माया कहा है। यह अन्तिम नहीं है, इस सूत्र में कहा गया है कि अन्य साधनों से साधक संप्रज्ञात समाधि तक तो जा सकता है ।
किंतु असम्प्रज्ञात समाधि में पहुंचने के लिए प्रयत्न काम नहीं आते । वहां सभी क्रियाएं छूट जाती हैं । साधक साधन विहीन हो जाता है कि अब क्या करें ?
यहां आकर उसके रुक जाने की सम्भावना अधिक बढ़ जाती है । यहीं मार्गदर्शन के लिए गुरु की आवश्यकता होती है ।
इससे आगे का मार्ग अक्रिया का है पूर्ण श्रद्धा की यही आवश्यकता होती है । वरना वह भटक सकता है ।
यहाँ योग विधियाँ समाप्त हो जाती हैं। तथा सांख्य की विधि आवश्यक होती है । इस स्थिति में साधक को केवल दृष्टा या साक्षी बन जाना होता है ।
इस समय ईश्वर भक्ति अर्थात् ईश्वर शरणागति से शीघ्र ही निर्बीज समाधि की सिद्धि होती है । अंत में जो अस्मिता शेष रह जाती है जिससे साधक उस आत्मा से भिन्नता का अनुभव करता है । अहं के त्याग से यह भिन्नता समाप्त होकर आत्मा के साथ एक रूप हो जाता है । यह द्वैत समाप्त होकर उसे अद्वैत की स्थिति का अनुभव होता है । जो साधक संप्रज्ञात समाधि में ही रुक जाते हैं उन्हें इस अद्वैत की अनुभूति नहीं होती। ऐसे ही लोग ईश्वर एवं जीव को भिन्न-भिन्न मानते हैं । इसलिए इस अद्वैत की स्थिति अथवा पूर्ण लय स्थिति में पहुंचने के लिए पतंजलि ने ईश्वर प्रणिधान का महत्व बताया है ।
यहां पहुंचकर ईश्वर के प्रति समर्पण से यह निर्बीज समाधि शीघ्र ही सिद्ध होती है । जो समर्पित नहीं हो सकते उनका अहंकार जीवित रहता है जिससे वे ईश्वर एवं आत्मा की भिन्नता का ही अनुभव करते हैं । यही उनकी सबसे बड़ी बाधा है । ऐसे व्यक्ति योग भ्रष्ट कहलाते हैं ।
उनका पुनर्जन्म फिर होता है । भक्ति में आरंभ से ही समर्पण हो जाता है जिससे यह अंतिम बाधा नहीं रहती । गीता में इसे विस्तार से समझाया गया है । भक्ति के अन्तर्गत पांच प्रकार की मुक्ति बताई गई है । {सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य,तथा सायुज्य} इसमें अंतिम ‘सायुज्य मुक्ति’ यही अवस्था है ।

स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार ।

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