
लेखक – ओम कश्यप
मां… तू बहुत याद आती है,
तेरी बातें अब भी दिल को रुलाती हैं।
तेरे बिना ये घर खाली-खाली लगता है,
हर कोना तेरे आंचल की खुशबू से सजता है।
तू कहां चली गई मां, यूं छोड़कर इस दुनिया को,
तेरे बिना सूनी लगती है सांसों की भी धुनिया को।
तेरे हाथों का स्पर्श अब भी महसूस होता है,
पर तेरी आवाज़ का सन्नाटा दिल को तोड़ता है।
मैं अभागा… तुझे सुकून ना दे सका ज़िंदगी में,
तेरी ममता का ऋण उतार ना पाया इन सांसों की बंदगी में।
तू हर दर्द में मुस्कुराती रही, मुझे हंसाती रही,
और मैं तेरी थकान को कभी देख ही न सका — यही गलती निभाती रही।
अब जब तेरा चेहरा याद आता है मां,
आंखों से बरसात उतर आती है।
तेरे बिना जन्नत का मतलब अधूरा लगता है,
तेरी ममता ही असली खुदा की पहचान बताती है।
जो लोग आज भी मां का प्यार पाते हैं,
वो सच में सबसे खुशनसीब कहलाते हैं।
मां तेरी बराबरी किससे करें इस दुनिया में,
तेरे जैसा कोई नहीं — न पहले था, न अब होगा जमाना में।













