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पूस की रात

पूस की रात के
अनकहे किस्से
सुनाएं कैसे,
नेत्र सजल होते।।
होठ कांपते कुछ
बोल न पाते ।
कंठ सूख जाता
हाथ कंपकंपाते
बेबस लाचार
वृद्ध मां,
चलने में अक्षम,
हाड़ कंपाती ठंड,
करती उसको बेदम।।
करते अनुचित व्यवहार,
उम्र की मजबूरी
अंग प्रत्यंग शिथिल
वृद्धा के मन को करते थे बेकल
खराब होने के डर से
पलंग पर ना लिटाते,
जमीन में कम बिस्तरों में लेटाते ,
देखकर स्तब्ध,
कुछ न बोल पाने का दुख
छाती से लिपटे पैर हाथ,
एक कंबल की याचना,
पूरी कर,
लौटते घर सजल नयन ,
पूस की एक  रात
आयी शीतलहर
बूंदाबांदी के बीच आई खबर
कल दादी उम्र पूरी कर
स्वर्ग लोक गई,
छाती से लगे हाथ पैर
सीधे ना कर पायी
ना उढा पाए ढंग की  रजाई
न दे पाए भरपूर प्यार
बाद में  बिलखते
स्नेह दिखाते श्राद्ध खिलाते
लाखों लोग खाते ,
पूष की ठंड में
ठिठुरते हुए घर जाते।।

स्वरचित पुष्पा पाठक
छतरपुर मध्य प्रदेश

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