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अब जीने का हुनर मैं सीख गया हूँ

अब जीने का हुनर मैं सीख गया हूँ,
सिर्फ झूठ बोलता हूँ — दिन भी, रात भी।
क्योंकि सच बोल के कई बार पिट गया हूँ,
एक बार कहा था उनसे —
“तुम्हारी बहन बहुत अच्छी लगी है,
वो बिल्कुल सच्ची लगती है।”
बस, उसी सच पर वो मुझसे रूठ गई थी,
तब से सच को हमेशा के लिए भूल गया हूँ।

आओ, बाँट लें दुख-सुख अपने —
आधा-आधा कर लेते हैं।
कब तक लड़ते रहेंगे हम —
चलो, अब सुलह कर लेते हैं।
मैंने मान लिया — तेरे चाहने वाले कई हैं,
मगर जंगल में — शेर कभी अकेला नहीं रहता है।

धरा के धारा पर धारे बहुत हैं,
पर चुपचाप बहती है धरा, क्योंकि
उसे शोर नहीं, सफ़र करना आता है।
अब गुम हो गई शायद नदी की उफनती धारा,
राहें तो बचीं हैं, पर मंज़िल का पता नहीं।
कभी जो बहती थी जीवन बनकर,
अब थमी है — जैसे खुद से खफ़ा नहीं, पर थकी हुई हो।

दिल के बाज़ार में आई बड़ी गिरावट,
आजकल एक के साथ एक फ्री की बात।
आशिकों का हाल है और भी बुरा,
एक पर दो का ऑफ़र लगा रखा है पूरा।

आजकल बाज़ार उसी का है, जिसके हाथ में बाज़ी,
बाकी सब आशिकों से भी बदतर हैं — हाय-हाय!

आर एस लॉस्टम

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