
नदिया के किनारे सजल भोर आई,
घाट पे उमड़ी श्रद्धा की परछाई।
अरघ देत अँधियार में जोती जली,
सूरज देव के चरणन में रोशनी पली।
भोर भइल तs सबेरे-सबेरे,
घरे-घरे गूँजे गीत सुनेहरे।
“केलवा जे फरेला घवद से”,
मइया के जयकारा नभद से।
राम-सीता के संकल्प पुरान,
कर्ण के अर्घ में छुपल गाथा महान।
प्रियव्रत के मन की आस जुरी,
छठी मइया से दुनिया भरी।
ना कोई ढोंग, ना आडंबर के रंग,
बस शुद्ध मन, पवित्र प्रसंग।
नहाय-खाय से खरना तक,
संयम में लिपटा जीवन सबक।
साँझ के अर्घ्य में सूर्य अस्त भए,
भोर के अर्घ्य में नवा सूरज हँसे।
उगते-ढलते दोनों समय,
जीवन के दो रूप सम्हाले हमय।
जल में खड़ा व्रती मुस्काए,
सूरज के संग तन-मन नहाए।
विज्ञान बोले — किरणें ये दैवी,
देती जीवन, करती नवजीवी।
मइया षष्ठी, मातृ स्वरूपा,
बालकन के रखवइया रूपा।
हर घर में बरसे आशीष तुहार,
सुख, समृद्धि, शांति अपार।
छठ न त पर्व, न कोई रस्म,
यह जीवन के संग का मधुर प्रसंग।
जहाँ प्रकृति, भक्ति, विज्ञान मिले,
वहाँ छठी मइया के चरण खिले।
आर एस लॉस्टम













