
तत्रनिरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ।
तत्र= उस {ईश्वर} में; सर्वज्ञबीजम्=सर्वज्ञता का बीज {कारण} अर्थात् ज्ञान; निरतिशयं= निरतिशय है ।
अनुवाद– उस (ईश्वर) में सर्वज्ञता का बीज (ज्ञान) निरतिशय है ।
व्याख्या– इस सूत्र में ईश्वर के अनेकों गुणों में सर्वज्ञता कि गुण को बताया गया है कि ईश्वर सर्वज्ञ है । श्रृष्टि के समस्त ज्ञान का बीज उसमें विद्यमान है तथा वह निरतिशय है । उस ज्ञान से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं है सृष्टि का सम्पूर्ण ज्ञान उसी के ज्ञान की थोड़ी सी अभिव्यक्ति है । उच्च कोटि का ज्ञान उसी से आता है इसी कारण वेद, उपनिषद, पुराण, योग आदि के ज्ञान को ईश्वरीय माना जाता है वह ‘ज्ञान’ आता पुरुषों के माध्यम से है किंतु उसका स्वयं का नहीं होता समाज की स्थिति में ईश्वर से संपर्क होने पर यह ज्ञान प्रकट होता है इसलिए इसे ईश्वरीय कहा जाता है । क्योंकि उस समय मनुष्य की बुद्धि इन्द्रियाँ आदि शान्त हो जाती हैं मनुष्य में जो थोड़ी बहुत ज्ञान शक्ति है वह इस ईश्वर से है यदि मनुष्य में वह ईश्वर ना होता तो उसके ज्ञान का आधार ही नहीं रहता किंतु ज्ञान प्राप्ति के बाद भी मनुष्य सर्वज्ञ नहीं हो जाता क्योंकि जीव की अपनी सीमा है जैसे समुद्र का जल घड़े में भरने पर वह समुद्र का जल तो समुद्र के जल जैसा ही है किंतु समुद्र जैसी विशालता उसमें नहीं है । जीव और ईश्वर में यही अन्तर है । इसलिए जीव को अल्पज्ञ तथा ईश्वर को सर्वज्ञ कहा जाता है । जीव सीमित है ईश्वर असीम है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र–
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













