
तस्य वाचक: प्रणव:
तस्य= उस ईश्वर का; वाचकः= वाचक {नाम}; प्रणव:= प्रणव {ॐकार} है ।
अनुवाद– उस ईश्वर का वाचक {नाम} ‘प्रणव’ {ओ३कार} है ।
व्याख्या– यह संपूर्ण स्थूल विराट ब्रह्माण्ड एक ही शक्ति से निर्मित हुआ है किंतु वह शक्ति वैज्ञानिकों के विद्युत जैसी जड़ नहीं बल्कि चेतन है । वही चेतन सत्ता समस्त विश्व का कारण है ।
जिस प्रकार वैज्ञानिक कहते हैं कि आरम्भ में ऊर्जा ही थी उसी के घनीभूत होने से पदार्थ दिखाई देते हैं तथा उनका रूपांतरण पुनः ऊर्जा में हो सकता है ठीक इसी प्रकार की भाषा में आध्यात्म कहता है कि सृष्टि के आरम्भ में एक ही चेतन तत्व था जिसे ‘ब्रह्म’ कहा जाता है । यह सृष्टि उसी का फैलाव मात्र है ।
सृष्टि के अन्त में पुनः वही क्रम शेष रहेगा । इस चेतन तत्व को विभिन्न मतावलंबियों ने विभिन्न नाम दिए हैं ।
उपनिषद इसे ‘ब्रह्म’ कहता है सांख्य इसे ‘पुरुष’ कहता है, कबीर ने इसे राम कहा, इस तत्व के ऐश्वर्य के कारण इसे ईश्वर कहा गया, सभी आत्माओं में श्रेष्ठ होने से इसे परमात्मा कहते हैं, शैवों ने इसी तत्व को ‘शिव’ कहा है ।
इसके सिवाय भी उसके अनेक नाम दिए हैं–
जैसे अक्षर, आत्मा, परमेश्वर, नारायण, भगवान्, शेष आदि ।
किंतु यह सब नाम उसके एक-एक एक गुण को प्रकट करने वाले हैं जबकि *वह ईश्वर अनन्त गुणों वाला है । इसलिए उनका कोई नाम हो ही नहीं सकता ।
नाम के घेरे में बांधने से वह भी संकीर्ण हो जाता है जबकि वह इतना विराट है कि उसके नाम रूप परिभाषा आदि की संक्रीर्णता में बांटना मनुष्य की संकीर्ण बुद्धि का ही परिचायक है ।
*वास्तव में उसका ना कोई नाम है ना रूप ना आकर ना गुण बल्कि सभी उसी से हैं ।*
ऐसे चेतन तत्व को पतंजलि प्रणव {ॐकार} कहते हैं । यही उसका उपयुक्त नाम है । वेदों में भी इसी नाम से उसे व्यक्त किया गया है । ॐकार कोई शब्द नहीं है बल्कि ध्वनि है जो आरम्भ में थी । यह आहत नहीं अनाहत थी । योगियों को ध्यान तथा समाधि में किसी आकार वाला परमात्मा दिखाई नहीं देता जो दिखाई देता है वह मानसिक कल्पना मात्र है इसलिए आदि शंकराचार्य ने ऐसे दिखाई देने वाले परमात्मा को भी माया {भ्रम} कहा है । उस चेतन सत्ता का कोई नाम देना उपयुक्त नहीं है । किंतु आवश्यकता होने पर अभिव्यक्ति के लिए नाम देना ही पड़े तो {ॐकार} ही उसका सर्वश्रेष्ठ नाम हो सकता है । इसलिए कई धर्मों ने इसे ओम्, ओंकार, आदि नाम से स्वीकार किया है । आकृतियों के नाम दिए जा सकते हैं किंतु ईश्वर निराकार होने से उसका नाम देने से उसमें भी आकृति की भ्रांति होती है । इसलिए सभी नाम भ्रांतिपूर्ण हैं । वह ईश्वर चेतन सत्ता मात्र है । सृष्टि की समस्त सत्ताएं उसी से हैं । वह कोई व्यक्ति जैसा नहीं की स्वर्ग में बैठा है ना सम्राट जैसा है कि न्याय करता है दंड और पुरस्कार देता है जल-जला उठाता है, न कोई उसका निश्चित न्याय का दिन है कि एक दिन सब का न्याय करता है बाकी सोता रहता है । ये सब भ्रांतियाँ उसका नाम देने से हुईं जिससे उसको व्यक्ति जैसा समझ कर ये सारी व्याख्याएं कर डाली । इसलिए पतंजलि ने उसका ‘प्रणव’ {ॐकार} नाम देना उचित समझा । यही उसका वाचक है । यह भी उसका नाम नहीं है बल्कि एक सूक्ष्म ध्वनि है जो अक्षर है ।
उसका कभी नाश नहीं होता । गुरु नानक ने भी उस परम् सत्य {परमात्मा} को ॐकार नाम दिया है । उसका वही एक सत्य नाम है ।।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













