
‘ ।। चरणामृत और पं
भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप को स्नान कराने के बाद जो जल कटोरी में आता है वह {चरण-अमृत} चरणामृत कहलाता है ।।
शास्त्रों में कहा गया है–
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् ।
विष्णो पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।
अर्थात् —
भगवान विष्णु के चरणों का अमृतरूपी जल अनेक प्रकार के पापों का नाश करने वाला है । यह औषधि के समान है । जो चरणामृत का सेवन करता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता ।।
औषधीयगुण से भरपूर चरणामृत की विधि—
तांबे के लोटे या गिलास में शुद्ध जल {गंगाजल} तुलसी पत्ता, धुला हुआ काला तिल, गिलोय जैसे औषधीय तत्व को मिलाकर रात भर अथवा तीन घण्टा के बाद चरणोदक बनाकर पीना चाहिए ।।
चरणामृत लेने के नियम—
चरणामृत ग्रहण करने से पहले प्रणाम करें, परन्तु चरणोदक या पंचामृत पीने के बाद अपने सिर पर हाथ न फेरें, क्योंकि मस्तक ब्रह्म है, जिससे मष्तक पर जूठन नही लगे ।।
और दूसरी बात की जहां जल होता है वहां जीवन पनपता है आंख से ना दिखने वाले कीटाणु सर पर बैठेंगे जो स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं है ।।
चरणामृत का लाभ— आयुर्वेद की दृष्टि से चरणामृत स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार तांबे में अनेक रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है ।।
यह पौरुष शक्ति को बढ़ाने में भी गुणकारी है ।। तुलसी के रस से कई प्रकार रोग दूर होते हैं और इसका जल मस्तिष्क को शांति और निश्चलता प्रदान करता हैं ।।
चरणामृत स्मरण शक्ति को बढ़ाने सहायक होता है ।।
पञ्चामृत–
पंचामृत का अर्थ है इस धरती पर पाए जाने वाले पांच अमृत ।।
दूध, दही, घी, शहद, शक्कर {चीनी} अर्थात पांच पवित्र वस्तुओं से मिलकर पंचामृत बनता है ।।
इसी पञ्चामृत से देवगणों और भगवान का अभिषेक किया जाता है ।। पांचों प्रकार के मिश्रण से बनने वाला पंचामृत अनेक रोगों में लाभदायक और मन को शांति प्रदान करने वाला होता है ।। इसका एक आध्यात्मिक पक्ष भी है ।।
वह यह कि पंचामृत आत्मोन्नति के पाँच प्रतीक हैं ।।
दूध– दूध पंचामृत का प्रथम भाग है ।। यह शुभ्रता का प्रतीक है अर्थात हमारा जीवन {दूध} अमृत समान होना चाहिए ।।
दही– दही का गुण है कि यह दूसरों को अपने जैसा बनाता है । दही अपने भीतर घी जो निष्कलंकता का प्रतीक है, को छिपाये रहता है, ऐसे सद्गुण अपनाएं और दूसरों को भी अपने जैसा बनाएं ।।
घी– घी स्निग्धता और स्नेह का प्रतीक है ।। सभी से हमारे स्नेहयुक्त संबंध बने रहें, यही भावना है ।।
शहद — शहद मीठा होने के साथ ही बलशाली भी होता है । तन और मन से शक्तिशाली व्यक्ति ही सफलता पाता है ।।
शक्कर– शक्कर का गुण है मिठास, शक्कर चढ़ाने का अर्थ है जीवन में मिठास घोलें । मीठा बोलना सभी को अच्छा लगता है और इससे मधुर व्यवहार बनता है ।।
पंचामृत के लाभ– पंचामृत का सेवन करने से शरीर पुष्ट और रोगमुक्त रहता है ।।
पञ्चामृत से जैसे हम भगवान को स्नान कराते हैं, ऐसा ही स्वयं स्नान करने से शरीर की कांति बढ़ती है ।।
पंचामृत बनाने की विधि जो हमने अनुभव किया है —
दूध एक भाग = १०० ग्राम
दही चार भाग = ४०० “
घी आधा भाग = ५० “
शहद तीन भाग = ५० “
शक्कर आधा भाग = ५० “
लगभग पांच लोगों के लिए यह मात्रा पर्याप्त है ।।
हरिकृपा ।।
संकलन, संपादन, प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













