
किनारे पर बैठकर नज़ारा देख रहा हूँ,
साहिल से टकरा-टकरा कर दम तोड़ता समंदर देख रहा हूँ।
बहुत मुश्किल है — अपने स्थान पर बने रहना,
मैं घुट-घुटकर मरता किनारा देख रहा हूँ।
समंदर उफन रहा है गहराई में,
मैं साहिल पर बैठ — तूफ़ान देख रहा हूँ।
अपने अंदर समेटे सदियों की लहर,
समंदर रोज़ उबलता है,
मैं बस — एक मृत तट बनकर,
उसका हर उफान देख रहा हूँ।
अब नियंत्रण नहीं रहा — दोनों का, दोनों पर,
एक तरफ़ सागर का टूटा प्राण,
और दूसरी ओर छूटता कगार,
बस मैं…
इसी नज़ारे का — नज़र देख रहा हूँ।
आर एस लॉस्टम













