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आस्था का महापर्व छठ पूजा

 भारत में सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ। मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार छत में है और दूसरी बार कार्तिक मास में। चैत शुक्ल पक्ष में सच्ची पर बनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष सस्ती पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। स्त्री और पुरुष समान रूप से इस पर्व को मनाते हैं। छठ व्रत के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं, उनमें से एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राज पथ जूए में हार गए, तब श्री कृष्ण के द्वारा बताए जाने पर द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हुई तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल। लोक परंपरा के अनुसार सूर्य देव और सस्ती मैया का संबंध भाई- बहन का है।
    भारत देश त्योहारों का देश है। जहां धर्म का अपना ही महत्व है। छठ पूजा में सूर्य देवता की उपासना कर उनका अभिवादन किया जाता है। ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत भगवान सूर्य हैं, जिसका हमारे जीवन में विशेष महत्व है। हमारे देश में कृतज्ञ होना सिखाया जाता है, जिसमें हम हर उसे चीज के प्रति कृतज्ञ है जिसने हमारे जीवन में अपना योगदान दिया है। उसी तरह छठ पूजा के जरिए हम सूर्य देवता को धन्यवाद देते हैं। यही एक कारण है कि हम भारतवासी भावुक होते हैं, हमें हमारे धर्म से ही कोमलता का भाव मिलता है और यही भाव हमें दिल से एक दूसरे का बनाता है यही भाव हमें जीवन से जुड़ी हर संजीव और निर्जीव वस्तु का महत्व बताता है।
   छठ पर्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो षष्ठी तिथि को एक विशेष खगोलीय परिवर्तन की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती है, इस कारण इसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है।
   चार दिनों तक मनाया जाने वाला सूर्य उपासना का यह अनुपम महापर्व मुख्य रूप से बिहार ,झारखंड, उत्तर प्रदेश सहित संपूर्ण भारतवर्ष में बहुत ही धूमधाम और हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस महाव्रत के दौरान हर तरफ लोग भक्ति में सराबोर हो जाते हैं। हर ओर बस आपसी प्रेम, अपनापन सोहार्द पूर्ण वातावरण छा जाता है। जाति और धर्म का बंधन भी टूट जाता है। ऐसा लगता है मानों हर कोई इससे जुड़ गया हो। छठ जहां एक और लोक आस्था को मजबूती प्रदान करता है और हमारे सांस्कृतिक मूल्यों एवं संस्कारों को पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाने की कवायद करता है तो वहीं यह सामाजिक एकजुटता तथा सोहार्द का भी संदेश देता है।

डॉ मीना कुमारी परिहार

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