
बोलो मुझ तक आओगे?
या यूं ही चलते जाओगे?
शबरी की भांति बरसों से
मैं राह तुम्हारी तकती हूं।
साथ चले बरसों बीते
क्या मन तक पहुंच भी पाओगे?
या यूं ही चलते जाओगे?
गैर जरूरी जरूरतों को
पूरा करते आए हो।
मन के आंगन में भी क्या तुम
चांदनी रात में आओगे?
या यूं ही चलते जाओगे?
लहर पयोधी आती जाती
रहती है हर बार, समय की
लहर भी आती है,पर
करती है श्रृंगार “इक बार”।
समय के उस आनंद लहर में
बांह थामने आओगे? या
यूं ही चलते जाओगे??
प्रतीक्षारत हूं प्रिय अब भी मैं,
क्या मुझ तक पहुंच पाओगे?
बोलो प्रिय, तुम अब बोलो,
क्या सच में मुझ तक आओगे?
या यूं ही चलते जाओगे??
सुलेखा चटर्जी













