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जब मन में निराशा छाने लगे

जब मन में निराशा छाने लगे,
सँवारो खुद को — जैसे कोई त्योहार हो चले।
थैला टाँगो बाहों में,
पैसा जेब में हो या न हो,
निकल पड़ो बाजार की राह पर —
कुछ वस्तु का मूल्य पूछो,
उसका तोल-मोल करो,

फिर मुस्कुराते हुए लौट आओ घर।
कभी-कभी जीवन का अर्थ
सिर्फ बाहर निकलने में छिपा होता है। 🌿

जिंदगी जीने का नाम है,
घुटन में सिमट जाने का नहीं।
जीवन — बस जीवन है,
कोई वस्तु नहीं, जो खरीदी या बेची जाए।

इसके दो पहलू हैं — सुख और दुख,
पर जिंदगी, इन दोनों में नहीं ।
वो तो बस जिंदगी है,
जिसमें मायूसी की जगह नहीं,
सिर्फ बहता हुआ एहसास है —
हर सांस के साथ, हर पल नया।

आर. एस. लॉस्टम

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