
लहरों पर घर बनाने का मन करता है,
मौजों में डूब जाने का मन करता है।
एक अपना भी आशियाना हो तरंगों पर,
बस आसमान सजाने का मन करता है।
पर्वतों से ऊँचा हो अपना ओहदा,
बस पर्वतों को झुकाने का मन करता है।
अब भी बाकी है कुछ उम्मीद ख्वाइशों की,
महफ़िलों में सज जाने का मन करता है।
सितारे चारों दिशाओं में बिखरे पड़े हैं,
धरती पर आज चाँद भी उतर आया है।
क्या दूँ तुझे, मेरी प्रिय, इस जहाँ में —
बस तेरे साथ दरिया में कूद जाने का मन करता है।
तेरी मुस्कान में है सारी रौशनी जग की,
तेरी आँखों में मेरा खुदा समाया है।
कुछ माँगूँ भी तो क्या माँगूँ अब मैं,
तेरे साथ ही जीवन बिताने का मन करता है।
आर एस लॉस्टम













