
कई दिनों से
सूरज तो आता है
मेरी देहरी पर
प्रभात की उंगली थामें
किन्तु मेरी देहरी में
धूप ही नही उतरती।
गौरइया भी चहकती
तो है मेरे आंगन में
पर उसके चहचहाने के
गीत नहीं गूँजते।
मेरी पलकों की ड्योढ़ी पर
नींद तो रहती है
पर आँखें है कि
बंद ही नही होती....
और ख्वाब है कि
खुद-ब-खुद चले जाते
किसी और जहां में।
घड़ी की सुइयाँ चलती तो है
समय के साथ
किन्तु वक्त है कि
रुका-सा रहता है।
समस्त क्रियायें हो रही है
स्वतः ही
फिर भी सब ठहर-सा
गया है
कहीं भी कुछ भी
न होना
ये सब तुम्हारा ही
ना होना है !!
डॉ. पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, म.प्र.













