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कुसंग— स्वरचित कविता

(१)
धीरे-धीरे मन में घुलता, मुस्कान भरा ज़हर,
झूठ लपेटे सत्य को, दिखे बड़ा ही सुन्दर।
पहले लगता साथ मधुर, फिर बाँध ले जीवन,
मोह जाल में फँस के खोता, सारा आत्मा-चिंतन।

(२)
कुसंग न केवल व्यक्ति है, यह सोच का रोग,
जो सच्चे मन को मलिन करे, दे छल का भोग।
धर्म और अधर्म के बीच, मिटता जाता भेद,
सुख का वादा करता जग, मिलता केवल खेद।

(३)
जहाँ कुसंग का धुआँ उठे, बुझ जाए मनदीप,
सच की किरणें खो जाएँ, सोए विवेक अतीत।
मनुष्य वही जागरूक है, जो संगत को जाने,
सुने वह सबकी, पर बात अपने दिल की माने।

(४)
सत्संग वह अमृत है, जो हर ले विष का रंग,
जहाँ वाणी हो शांत, और मौन बने सत्संग।
जो मन को ऊँचा कर दे, वही साथ शुभ मानो,
झूठे दिखावे छोड़कर, सच्चे स्नेह को जानो।

(५)
धीरे-धीरे मन पर जमती, दूषित संग की धूल,
सत्य-सुगंध बिखर न पाए, झूठ करे सब भूल।
कुसंग रूपी रात में डूबा, मन होता निर्बल,
भूल विवेक, खो दे विश्वास, बन जाए अधर्ममल।

(६)
राहु-शनि की दृष्टि जहाँ हो, भ्रम बढ़े संसार,
माया-जाल में उलझा मन, खो दे सारा प्यार।
जो संग करे हरि से दूर, वह विषधर का साथ,
जो जोड़े आत्मा से हमें, वही सच्चा प्रभात।

(७)
छोड़ो झूठी चाहतों को, तोड़ो भ्रम के जाल,
सच्चे मन का साथ लो, यही अमृत का थाल।
जहाँ हृदय में सत्य रहे, निर्मल भाव का संग,
वहीं से शुरू हो जीवन में, प्रकाशमय प्रसंग।

(८)
सत्संग ही वह सूर्य है, जो तम को हर जाए,
कुसंग रूपी कर्मरात्रि को, प्रभात बना जाए।
सत्संग साधो प्रेम से, मन को कर उजियार,
यही है जीवन की दिशा, सच्चा धर्म आधार।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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