समाधि पाद सूत्र– २९

ततः प्रत्येक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तराया भावश्च ।
ततः= उक्त साधन से; अन्तरायाभाव= विघ्नों का अभाव; च= और; प्रत्यक्चेतनाधिगमः= अन्तरात्मा के स्वरूप का ज्ञान; अपि= भी {हो जाता है} ।
अनुवाद– उक्त साधन से विघ्नों का अभाव और अन्तरात्मा के स्वरूप का ज्ञान भी हो जाता है ।
व्याख्या– आत्मा जब अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है तो सभी साधन समाप्त हो जाते हैं । यही मंजिल है जहां पहुंचना है । इस स्थिति तक पहुँचने में चित्त की वृत्तियों का निरोध मात्र पर्याप्त है किंतु इस निरोध की प्रक्रिया में कई प्रकार के विघ्न आते हैं । जिनके निवारण के लिए पतंजलि ने ॐकार का जप तथा उसके स्वरूप का ध्यान मुख्य बताया है ।
साधना की सभी प्रक्रियाएं और अस्वाभाविक हैं मन की सदा विषयों की ओर भागने की ही वृत्ति है । जब उसे हठपूर्वक रोककर ध्यान अथवा ईश्वर की प्राप्ति की ओर लगाया जाता है तो यह उसके लिए आज अस्वाभाविक होने से वह विद्रोह करता है ।
यह विद्रोह ही विघ्न स्वरूप है जिससे साधक अपने ध्येय से विचलित होकर पुनः विषयों की ओर आकर्षित होता है । यदि वह अपने मार्ग से हट गया तो वह योग भ्रष्ट कहलाता है ।
यह साँप-सीढ़ी के खेल जैसा है । अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति के समीप पहुँचा हुआ भी तो थोड़े से विघ्न से वह जहाँ से चला था वहाँ पहुंच जाता है ।
महर्षि पतंजलि इन विघ्नों से सावधान करते हुए कहते हैं कि इन दोनों साधनों से वह सभी प्रकार के विघ्नों को पार कर निर्बीज समाधि को उपलब्ध हो सकता है ।
हर योग्य साधक को ये विघ्न सताते ही हैं । जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते उनका अहंकार बच जाता है चाहे वह सत्यगुण मिश्रित ही क्यों ना हो ।
इसलिए उनको कभी निर्बीज समाधि उपलब्ध नहीं हो सकती ।
इसलिए ईश्वर का जप व ध्यान करना उसकी शरणागति, उसकी विशेषताओं आदि का ध्यान करना सभी धर्मों ने स्वीकार किया है जो अकारण नहीं है ।
सूफियों एवं हिन्दुओं ने योग के साथ ईश्वर शरणागति को जोड़कर उपलब्धि के द्वार खोल दिए ।
नानक ने भी ज्ञान खण्ड में आखिरी ऊँचाई अद्वैत मानी है जहाँ बाहर और भीतर का भेद गिर जाता है ।
कबीर ने भी घड़ा फूटने पर बाहर और भीतर के जल को एक होना बताया है । यही अद्वैत का अनुभव है ।
जब सारी वासनाएँ गिर जाती है तो केवल ओ३म् की ध्वनि शेष रह जाती है । पतंजलि ने इसी को ‘ईश्वर’ कहा है । ओ३म् के जप के साथ ध्यान आवश्यक है वरना साधक नींद में भी चला जाएगा । इसलिए उसका जप और ध्यान मिलकर पूर्व विधि है ।।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन व प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













