
पल दो पल बस साथ चलो,
दो पल ही सही, मैं खुश हो लूँ।
किस्मत ने राह अलग कर दी,
दिल में ही सही वो पल रख लूं।
इस पागल मन को क्या कह लूं,
क्यों याद करे बस वह लम्हा,
अंजान ही थे जब साथ चले हम,
फिर मन टूटा,अब मैं रो लूं।
आज भी मैं सोचूं उस पल को,
जिस बीच, बरस इतने बीते,
सोचूँ अब मैं,वो संचित निधि है
बस सहेज कर मन में रख लूं।
सुलेखा चटर्जी













