
कब आओगे, प्रिय
प्राण-पखेरू छूट रहे हैं,
शाखाओं से पत्ते झर रहे हैं,
टहनियाँ अपने आप ही टूट रही हैं —
कब आओगे, प्रिय।
मर रहा है अब जिस्म मेरा
करुणा के ही भार से,
पत्ता-पत्ता, डाल-डाल,
जड़ें भी अब सूख रही हैं —
कब आओगे, प्रिय।
एक बाग लगाया था
अपनी पूरी उम्र सींच कर,
कुछ मुरझा गए,
कुछ निःफल ही रह गए —
कब आओगे, प्रिय।
अब आँखें मेरी थक चुकी हैं,
लफ़्ज़ भी अब काँपते हैं,
तन चिढ़ाता है मुझे अब,
जिस्म से भी परतें छूट रही हैं —
कब आओगे, प्रिय।
प्राण-पखेरू छूट रहे हैं…
आर एस लॉस्टम













