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तिलक- लघुकथा


लेखक: कौशल


गांव कोहली की संकरी गलियों में कोंचा का घर सबसे आखिरी था—एक टूटा-फूटा आशियाना, जहां हवा भी दबी सांसों से गुजरती। छत की खपरैल बारिश में रोतीं, और कोंचा रात भर उन्हें थपथपाता, जैसे मां को सुलाता हो। गांव वाले उसे ‘कोंचा काई’ कहते, पर उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी—जैसे कोई पुरानी याद बार-बार जलती हो।

हर शाम वह खेत की मेड़ पर बैठता, उसी जगह जहां पांच बरस पहले उसकी मां ने आखिरी सांस ली थी। मां का हाथ उसके माथे पर था, और फुसफुसाहट— “बेटा, तिलक लगाना मत भूलना। ये सिर्फ रंग नहीं, वादा है।” फिर मां की उंगलियां ठंडी पड़ गईं, और कोंचा की दुनिया सूनी।

एक सुबह पंचायत में हलचल हुई। सरपंच बोले, “आज तिलक का दिन। सबसे सुंदर तिलक लगाने वाले को राजा की सोने की अंगूठी!” बच्चे दौड़े—लाल चंदन, केसर, गुलाब की पंखुड़ियां। हंसी, गीत, खुशबू।

कोंचा खेत में अकेला बैठा रहा। उसके पास कुछ नहीं था। सिर्फ मां का दिया पुराना डिब्बा—लकड़ी का, टूटा किनारा, अंदर एक चुटकी लाल मिट्टी। उसी खेत की, जहां मां सोई थी। वह मिट्टी को उंगलियों से छूता, जैसे मां की हथेली।

राधा आई, “कोंचा, तू क्यों नहीं लगाता?”

कोंचा की आंखें भर आईं। “मैं तो रोज लगाता हूं, राधा। बस… कोई देखता नहीं।”

पंचायत के मैदान में भीड़। तिलक चमकते—हीरे जैसे, फूल जैसे। सरपंच मुस्कुराते। तभी कोंचा धीरे-धीरे आगे आया। उसने डिब्बा खोला। मिट्टी हाथ में ली। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। माथे पर लगाया—सादा, लाल, बिना चमक। जैसे खून की बूंद।

हंसी गूंजी। “अरे, ये कीचड़ है!”

सरपंच गुस्से में, “कोंचा, ये तिलक नहीं, अपमान है!”

कोंचा की आवाज फटी, पर टूटी नहीं। “सरपंच जी… ये मेरी मां की मिट्टी है। वो मरते वक्त बोलीं—’बेटा, जब तन्हा लगे, ये लगा लेना। मैं यहीं हूं।’ हर रात मैं लगाता हूं। सोते वक्त माथा ठंडा होता है। जैसे मां का हाथ।”

वह रुका। आंसू मिट्टी में मिल गए, गाढ़ा लाल हो गया। “चमक तो धो जाती है… मां नहीं धोती।”

सन्नाटा। सरपंच की हथेली कांपी। उन्होंने अंगूठी उठाई, कोंचा के सामने घुटने टेके। “बेटा, तूने आज तिलक का मतलब बताया। ये रंग नहीं… रिहाई है।”

अंगूठी कोंचा की उंगली में फिसली। वह मुड़ा, खेत की ओर चला। माथे पर वही लाल निशान—अब चमक रहा था, जैसे मां की आंखें।

राधा ने पीछे से पुकारा, “कोंचा!”

वह रुका, मुस्कुराया। “बता राधा, आज मां ने देखा ना?”

और कोहली गांव ने सीखा—सबसे सुंदर तिलक वो नहीं जो चमके,
बल्कि वो जो रोके… आंसू को मां तक पहुंचा दे।


प्रकार: मौलिक लघुकथा (काल्पनिक)
सीख: सच्ची सुंदरता चमक में नहीं, सच्चाई और प्रेम में होती है। तिलक कोई बाहरी आभूषण नहीं, बल्कि दिल का वादा, ममता का निशान और यादों का स्पर्श है। जो चीज हमें अपनों से जोड़े, वही सबसे कीमती है—चाहे वह एक चुटकी मिट्टी ही क्यों न हो।।

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