
हे गौरी शंकर अर्धांगिनी,
यथा त्वम शंकर प्रिया,
तथा माम कुरु कल्याणी,
कांत कांतम सुदुर्लभम ॥
शिव के प्रति पार्वती का प्रेम,
उनकी भूल नहीं हो सकती है,
पागलपन कहना शिव प्रेमी को
कुछ अति शयोक्ति सी लगती है।
इसके विपरीत अगर हम देखें तो
शिव स्वयं शिवा के अद्भुत प्रेमी थे,
अर्धनारीश्वर शिव सिवा शिवा के,
और नहीं किसी को मन में रखते थे।
पार्वती के मन में शिव को वरण करें,
और न कोई मन में आये,यह हठ था,
शिव स्वयं शिवा को, शिवा शिव को,
एक दूसरे के लिये ही पूर्ण समर्पण था।
दसानन को याद करो शिवभक्ति में,
सिर काट शिव को किया समर्पित था,
यह केवल उसकी भक्ति थी शायद,
शक्ति असीम पाने के लिए ही हठ था।
शिव की महिमा शिव ही जाने,
और नही कोई भी जान सकेगा,
मत करो चेष्ठा या संशय कोई भी,
देवाधिदेव शिव को न पहचान सकेगा।
आदित्य अर्चना है सबकी शिव से,
सबको पार्वती सी अर्धांगिनी मिलें,
शिव समान वर मिले हर नारी को,
शिव शिवा सम सबको प्रेम मिले।
डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ













