Uncategorized
Trending

संघ का सिपाही नरेन्द्र

वडनगर की शाखा में बालक खड़ा,
आँखों में सेवा का दीप जला।
आठ बरस का था, पर मन विशाल,
राष्ट्रभक्ति बन गई जीवन का ख्याल।

धरती झाड़े, झंडा लगाए,
अनुशासन की राह अपनाए।
संघ के गीतों में पाया स्वर,
भारत माँ का बना था पुत्र अमर।

जब किशोर हुआ, मन ने कहा —
“अब जीवन केवल राष्ट्र रहा।”
घर का सुख, अपना संसार,
सब त्याग दिया, अपनाया संघ का द्वार।

प्रचारक बना सन् इकहत्तर में,
कंधों पर दायित्व उठा देश के सफर में।
वडनगर से लेकर अहमदाबाद तक,
सेवा, साधना, समर्पण का पथ।

वडोदरा की गलियों में जगाई चेतना,
सूरत में बोई नई समरसता।
युवाओं में जोश, समाज में प्रकाश,
हर शिविर में गूँजता “भारत विकास।”

आपातकाल आया, अंधियारा घना,
पर मोदी न रुके, जले दीप तना।
पत्र बाँटे गुप्त, जगाई लौ,
सत्ता के विरुद्ध चला वो संकल्प शो।

पंद्रह बरस की तपस्या के बाद,
संघ ने दिया राजनीति का प्रसाद।
भेजा उसे जन-सेवा के मैदान में,
भा.ज.पा. बनी कर्मभूमि उसके ज्ञान में।

वो प्रचारक था, पर था द्रष्टा महान,
अनुशासन, रणनीति उसका पहचान।
संघ ने गढ़ा जो कर्मयोगी वीर,
वो बना देश का जाग्रत अधीर।


संघ का सिपाही, सेवा का पुजारी,
त्याग की मूरत, कर्म का अधिकारी।
जिसने सीखा समर्पण का मंत्र,
वही बना भारत का केंद्र।

आर एस लॉस्टम

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *