हे विष्णु प्रिये मां जग जननी,
जग पालिनि भव भय हारिणि हे!
स्वीकार करो विनती मेरी,
पय-निधि के लहर विहारिणि हे!!
गाऊं यश गान सदा तेरी,
चरणों में शीश झुकाऊं मैं!
भरदो झोली सत्कर्मों से,
सत पथ पर पाँव बढ़ाऊं मैं !!
जीवन में दीन दुखी जन के,
नित काम सदा मां आऊं मैं!
असहाय जनों की सेवा का,
प्रति-पल यह बोझ उठाऊं मैं!!
अपनों की राह धवल करती,
तुम हो दुष्कर्म निवारिणी हे !
स्वीकार करो बिनती मेरी,
पय निधि के लहर विहारिणि हे।।1।।
सार्थक सक्रिय यह जीवन हो,
अलम्ब तुम्हारी हमें सदा !
निष्कलंक रखो जीवन जननी,
नहिं घेर सके कोई विपदा !!
मां प्रतिपल राह निहारूं मैं,
तल्लीन रहूं तव चरणन में!
‘जिज्ञासु’ सुधिजन अभिलाषा,
तुम पूर्ण करो नवरागन में !!
आशा की डोर गहो जननी,
पारस सा तुम उद्धारिणि हो!
स्वीकार करो बिनती मेरी,
पय-निधि के लहर विहारिणि हे।।2।।
कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’













