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समाधि पाद सूत्र– ३२*

तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्वाभ्यासः ।

तत्प्रतिषेधार्थम्= उनको दूर करने के लिए; एकतत्वाभ्यास:= एक तत्व का अभ्यास {करना चाहिए} ।

अनुवाद– उन विघ्नों को दूर करने के लिए एक तत्व का अभ्यास करना चाहिए ।

व्याख्या– इन विघ्नों को दूर करने के लिए पतंजलि एक तत्व अभ्यास की बात कहते हैं कि ईश्वर शरणागति यदि पूर्ण विश्वास के साथ होती है तो ईश्वर स्वयं उसका हाथ थाम लेता है । अपने को असहाय मानकर यदि ईश्वर के भरोसे पूर्ण श्रद्धा के साथ छोड़ दिया जाए तो वह ईश्वर स्वयं सर्व दुखों का नाश कर देता है । ऐसा कइयों के साथ हुआ है । यदि अभ्यास ही आवश्यक हो तो ओम् का उच्चारण करना चाहिए इसकी ध्वनि की तरंगों से भीतर परिवर्तन होता है जिससे सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं ।

शरीर के भीतर एक विद्युत प्रवाह चलता रहता है उसमें रुकावट आती है तो बीमारी है ।
इसी विद्युत प्रवाहकी ओम् की ध्वनि से ठीक किया जा सकता है तथा मनुष्य स्वस्थ हो जाता है ।
इसके उच्चारण से वाचा सिद्धि भी होती है । इससे काम भावना भी शान्त होती है तथा चित्त शांत होता है । अतः योग साधक को इस स्थिति में उस एक ही तत्व ओम् का अभ्यास करना चाहिए ।
इससे ये उपद्रव अपने आप शान्त हो जाएँगे ।
ए उपद्रव अशान्त चित्त के लक्षण मात्र हैं ।।

स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार

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