
प्रच्छर्दनविधारणाभ्याँ वा प्राणस्य ।
वा= अथवा; प्राणस्य= प्राण वायु को; प्रच्छर्दनविधारणाभ्याम्= बारम्बार बाहर निकलने और रोकने अभ्यास से भी {चित्त निर्मल होता है} ।
अनुवाद– अथवा प्राणवायु को बार-बार निकलने और रोकने के अभ्यास से भी चित्त प्रसन्न होता है ।
व्याख्या– महर्षि पतंजलि इस सूत्र में कहते हैं कि यदि यह साधन कठिन हो नहीं किया जा सके अथवा करने में लम्बा समय लगे तो श्वाँस का प्रयोग किया जा सकता है । प्राणवायु जो श्वाँस के द्वारा हम भीतर लेते हैं तथा बाहर छोड़ते हैं उसे बार-बार बाहर निकालने तथा थोड़ी देर बाहर ही इसे रोके रखने का अभ्यास करना चाहिए यह प्राणायाम की एक विधि है इससे चरित्र निर्मल तथा शान्त हो जाता है । *प्राणायाम का प्रयोग विधिपूर्वक ही करना चाहिए तथा गुरु से सीख लेना चाहिए, वरना इसके दुष्परिणाम भी होते हैं जिससे शरीर में विकृति पैदा होकर वह रोग ग्रस्त भी हो सकता है ।
इसकी विधि है– सुखासन, सिद्धासन अथवा पद्मासन में बैठे रीढ़ की हड्डी सीधी रखें, कमर सीधी रहे, गर्दन सीधी रहे फिर श्वाँस गहरी भीतर खींचे तथा उसे नाभि तक ले जावें। फिर उसे जोर से बाहर फेंकें, फिर उसे थोड़ी देर बाहर ही रोक रखें {यह भी कुंभक है}, पेट को भीतर की ओर दबावें जिससे अधिकतम वायु बाहर निकल जाए । फिर गहरी श्वाँस खींचें व फिर छोड़ें । इस क्रिया को बार-बार करने से विचारों में परिवर्तन आ जाता है तथा नदियां नाड़ियों का दूषित मल बाहर निकलता है जिससे चित्त प्रसन्न एवं निर्मल हो जाता है । क्रोध भी शान्त हो जाता है । इस प्रयोग को धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए पहली ही बार अधिक समय नहीं करना चाहिए ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













