Uncategorized
Trending

इंडोनेशिया में भारतीय संस्कृति और रामलीला

    भारतीय संस्कृति का संवाहक है इंडोनेशिया । भारत के निकटवर्ती देशों में इंडोनेशिया एक ऐसा देश है जिसका बाली द्वीप हिंदू संस्कृति  की खुशबू से सराबोर है।
   लगभग  90  फीसदी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में हिंदू धर्म और मंदिरों की की संख्या अधिक है।

आइए हम भारतीय संस्कृति के बारे में कुछ जानें और किस प्रकार इंडोनेशिया हमारी संस्कृति को अपनाया है ।
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम में मानी जाती है।
भारत की संस्कृति आज भी भारतीय संस्कृति की प्राचीनता वेदों की प्रमाणिकता, स्वामी महावीर एवं गौतम बुद्ध का अहिंसा एवं शांति, देवता समाज, संस्कार आदि भारतीय संस्कृति में देखने को मिलता है। रामायण, महाभारत, वेद उपनिषद, पुराण आदि साहित्यों को आज भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण विशेषता अध्यात्मिकता भी रही है जो इंडोनेशिया में देखने को मिलती है।
ग्रहणशीलता से तात्पर्य यह है कि किसी भी अन्य वस्तु को अपनाना
इंडोनेशिया ग्रहणशीलता को पूर्ण रूप से अपनाया है, जिसे आप देख सकते हैं।
भारतीय संस्कृति में विश्व को शांति, अहिंसा, सद्भावना, राष्ट्रीयता, मैत्री भाव, अपनत्व का सिद्धांत दिया है। वहां की संस्कृति में इस सिद्धांत पर विशेष बल दिया गया है।
विश्व बंधुत्व की भावना को लेकर भारतीयों का एक नारा है-
“सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मां कश्चित् दुख भाग भवेत्”
आप अगर इंडोनेशिया घूमने जाते हैं तो आपको लगेगा ही नहीं कि आप विदेश में आए हुए हैं, क्योंकि विश्व बंधुत्व की भावना वहां के लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई है।
भारतीय संस्कृति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है विभिन्नता में एकता, मुस्लिम समुदाय की बहुलता के बावजूद, अनेक समुदायों के बावजूद भी वहां के सारे लोग एक हैं।
अतः हम कह सकते हैं की इंडोनेशिया भारतीय संस्कृति से सराबोर है।
बाली द्वीप का प्रतीक -चिन्ह देश की हिंदू परंपरा की अभिव्यक्ति है। दक्षिण- पूर्वी एशियाई देशों में वर्तमान रूप में भारतीय संस्कृति ने अहम भूमिका निभाई है। भारतीय प्रभाव के चिन्ह इंडोनेशियाई भाषा में बड़ी संख्या में संस्कृत शब्दों से प्राय स्पष्ट होता है।
ऐतिहासिक द्वीप बाली की संस्कृति पूरे विश्व के पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करती है। बाली ने अपने गोद में बहुत सी सांस्कृतिक धरोहरों को समेटे हुए है। भारत की हिंदू सभ्यता यह पूरी तरह से आज भी जीवंत है। बाली में हिंदुत्व की नींव छठी- सातवीं शताब्दी में ऋषि मार्कण्डेय ने रखी थी। यहां जो भी पर्यटक आते हैं उनको भारतीय संस्कृति की झलक बखूबी से मिलती है।
इंडोनेशिया की पावन धरती पर उतरते ही भारतीय संस्कृति की विहंगम झलक देखने को मिल जाती है। लगता ही नहीं कि हम विदेश में आए हैं। हृदय मन यहां की संस्कृति को देख आह्लादित हो जाता है। एक खास बात जो देखने को मिलती है ,इंडोनेशिया
एयरलाइंस का लोगो ‘गरुड़ पक्षी’ है। गरुड़ को देखकर ही मन में स्मरण हो आता है भगवान श्री राम और गरुड़ पक्षी की कहानी।
गरुड़ पक्षी इंडोनेशिया का नेशनल एल्बम भी है। यह देश मुस्लिम भले ही हो लेकिन यहां की संस्कृति में भारतीयता कूट-कूट कर भरी हुई है।
मंदिर है यहां की शान-इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता जाने वाले यात्रियों के लिए उत्तर -पश्चिम तट पर स्थित
शहर के बीचों बीच भव्य निर्मित अनेक घोड़ों से खींचने वाले रथ पर श्री कृष्ण -अर्जुन की प्रतिमा सर्वाधिक आकर्षक करने वाली है। इस शहर में जगह-जगह हिंदू स्थापत्य कला का दर्शन भी होता है। वहीं इंडोनेशिया में पांच बड़े बड़े हिंदू मंदिर भी हैं। भारत के भगवान राम और अन्य कई देवताओं की मूर्तियां और मंदिर
सुगमता से मिल जाते हैं जो कि इंडोनेशिया को भारत की संस्कृति से कहीं न कहीं जोड़ने का काम करती है।
इंडोनेशिया की करेंसी पर उसमें गणेश जी की फोटो छपी हुई साफ साफ दिखाई देती है। गणेश भगवान को इंडोनेशिया में कला ,विज्ञान और शिक्षा के देवता के रूप में माना जाता है इसलिए वहां की करेंसी पर उनके ही फोटो छपे हुए हैं।
रामायण और महाभारत का प्रभाव पूरे इंडोनेशिया में है। बाली के लोगों में महाभारत के युद्ध -स्थल कुरुक्षेत्र को देखने की इच्छा प्रबल है। वहां के लोग गंगा में पवित्र स्नान करना तथा शिव मंदिरों मंदिरों को देखने के लिए
अपनी पहली प्राथमिकता देते हैं।
विदेशी संस्कृति के प्रभाव के बावजूद , कुछ सुदूर इंडोनेशियाई क्षेत्र अभी भी विशिष्ट स्वदेशी संस्कृति को संरक्षित करते हैं। स्वदेशी जातीय समूह मेंतवाई,अस्मत, दानी, दयाक, तोराजा और क‌ई अन्य कभी भी अपने जातीय अनुष्ठानों रीति-रिवाजों के अनुसार पारंपरिक कपड़े पहनते हैं।
इंडोनेशिया में रामायण का प्रभाव इतना गहरा है कि यहां की सारी संस्कृति बिल्कुल रामायण की पारंपरिक आस्था से जुड़ी हुई है। इंडोनेशिया में रामायण को काकाविन (काव्य )कहते हैं। देश के कई इलाकों में रामायण के अवशेष और रामकथा की नक्काशी वाले पत्थर भी मिलते हैं। भारत में जहां लोग आदि कवि ऋषि बाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण को मानते हैं जो संस्कृत भाषा में लिखी गई थी, वहीं इंडोनेशिया में कवि योगेश्वर द्वारा लिखित रामायण को माना जाता है जो कावी भाषा में लिखी गई थी।
” हुआ स्वयंबर का आयोजन
आते सारे भूप
राम-लखन भी हुए सम्मिलित
वह था दृश्य अनूप”
रामलीला एक ऐसा रंगमंच है जिसका प्रस्तुतीकरण आज से ही नहीं अपितु हजारों वर्षों से होता आ रहा है। पहले यह वाल्मीकि रचित रामायण पर आधारित था तो आजकल इसे तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस को आधार मानकर आयोजित किया जाता है। यह केवल एक नाटक ही नहीं है अपितु जीवन मूल्यों की एक खान है, जो समाज को संदेश देती है।
“जीत हुई उनकी भक्ति की
स्वयं आ गये राम
बहे खुशी के अश्रु नयन से
शबरी के अविराम “
यहां का रामलीला विश्व विख्यात है। यहां रामलीला का नाट्य -मंचन पूरे वर्ष किया जाता है। यहां के लोग किसी भी विशेष अवसर पर रामलीला करवाते हैं। यहां तक कि इस देश में स्कूलों में शिक्षा देने के लिए भी रामायण के चरित्रों का उपयोग करते हैं।
भारत और इंडोनेशिया की साहित्य व संस्कृति एक समान है। इंडोनेशिया एक ऐसा देश जिसका धर्म इस्लाम है और संस्कृति रामायण है। मुस्लिम आबादी की अधिकता के बावजूद यहां रामलीला का मंचन होना बहुत बड़ी बात है।
रामलीला समाज में मानवता और जीवन के सार्थक मूल्यों का संदेश देता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इंडोनेशिया एक मुस्लिम प्रधान देश है लेकिन फिर भी उनकी संस्कृति मैं रामायण की एक गहरी छाप है। उनका मानना है की रामचरित्र जीवन की संपूर्णता का प्रतीक है।
” रामायण काकाविन” ज्यादातर नृत्य नाटक के रूप में
प्रदर्शित किया जाता है। इंडोनेशिया में रामायण का प्रभाव इतना गहरा है कि यहां की सारी संस्कृति रामायण की पारंपरिक आस्था से जुड़ी हुई है। इंडोनेशिया की रामलीला का मंचन दुनियां भर में प्रसिद्ध है।
“लिया एक संकल्प दशानन
चली एक फिर चाल
सीता को हरने के खातिर
लगा बिछाने जाल”

डॉ मीना कुमारी परिहार’मान्या’

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *