
खेल “लूडो” है सच में पुरातन,
बनाने वालों ने बनाया है,
सोच कर मानव जीवन।
अर्थ, धर्म,काम,मोक्ष,
इन्हीं चार के दायरे में बंधी
है हर इंसान की सोच।
भगवान के चलाएं पांसे में
तकदीर से यदि किसी के” छः ” आता है,
करुणामय के आशीर्वाद से वही
इस घेरे से बाहर निकल पाता है।
तत्पश्चात यात्रा प्रारंभ होती है
अपने “घर” की ओर–
लोभ दिखाकर अर्थ और काम की तरफ
घसीटने, राह में मिल जाते हैं कई चोर!!
सोच समझकर राह जो ना चुनी गई,
समझ लो इन चोरों के द्वारा “मती ” छली गई।
बस —वापस इसी घेरे में चले आओ,
जब समझ पाओ,तो हाय हाय करो पछताओ।
पुनः इस घेरे से बाहर आने की छटपटाहट
और प्रभु कृपा के लिए प्रार्थना प्रारंभ—
फिर होता है दूसरे जन्म का आरंभ।
जन्म जन्मान्तर यही तो चलता है,
इंसान फिर से वहीं से यात्रा प्रारंभ करता है….
लूडो इसी सोच की “प्रतिमूर्ति” है —
मानव की जीवन धारा यूं ही तो चलती है!!!
सुलेखा चटर्जी













