
श्रेणी- हास्य (ऐसा कभी संभव नहीं है)
रचनाकार -कौशल
सूरज डूबा नहीं, उगता रहा रात में,
चाँद ने सूरज को गले लगाया बात में।
पर्वत उड़ते फिरें, नदियाँ पीछे बहें,
ऐसा झूठ गाऊँ, जो सच न बन पाए कहीं।
पक्षी तैरते समंदर में, मछली उड़ती आसमाँ,
पेड़ चलते फिरते, फल बिन फूलों के जहाँ।
समय रुक जाता है, घड़ी की सुईयाँ थम जाएँ,
मौत हँसती मर जाए, जीवन कभी न आए।
इंसान बिना साँस के, साँसें बिना दिल की,
प्यार बिना मिलन के, मिलन बिना जुदाई की।
आकाश धरती बन जाए, धरती आकाश उड़ान,
सपने जागते रहें, जागना हो जाए मिथ्या।
सूरज ठंडा हो जाए, बर्फ बने उसकी किरण,
अग्नि पानी पी जाए, धुआँ बने उसका ज्वलन।
पत्थर फूल बन जाएँ, काँटे गंध बिखेरें,
आँखें बिन देखें सब, कान बिन सुनें झंकारें।
बच्चे जन्में बूढ़े, बूढ़े हो जाएँ शिशु,
सूरज पश्चिम उगे, चाँद पूरब में हो विश्राम।
हवा ठोस हो जाए, चलना हो उस पर भारी,
सपनों में जागें हम, जागकर सपने हो जाएँ सारी।
सूरज डूबा नहीं, उगता रहा रात में,
चाँद ने सूरज को गले लगाया बात में।
ये झूठ का गीत है, जो कभी सच न हो पाए,
संसार की रीत में, ऐसा कभी न घट पाए।













