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सपेरों का राज

दुख जाता नहीं, रात कटती नहीं,
अंधियारा यहाँ अब छँटता नहीं।
उजाले भी अब बिकने लगे,
राज सपेरों का मिटता नहीं।

साँप गया अपने बिल के भीतर,
बीन लिए सपेरा फिरता नगर में।
ज़हर घुला है हर एक शख़्स में,
मरती जा रही है इंसानियत डगर में।

हम हैं कि अब भी खोज रहे,
कपटियों की आँखों में थोड़ा सा प्यार।
पर इंसानों के भेष में बैठा है,
दो-मुँहा नागों का सरदार।

तरस रहा है आसमान थोड़ा जल को,
प्यासी मर रही धरती बूंद-बूंद को।
ओस के कतरे भी अब रोने लगे,
शबनमी बिंदु ढूँढे अपनी प्यास।

आर एस लॉस्टम

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