
बाहर है हामी-मानी।
अंदर से आना-कानी।
पहचानी है आँखें पर,
नज़रें लगती अंजानी।
जीत ज़ुबानी बातों की,
जतलाती है हैरानी ।
भटकायेगी थोड़ा तो,
राह चले जब बेगानी।
भूल बड़ी बन जाती है,
इक छोटी सी नादानी।
जिनका है आना अक़्सर,
उनकी कैसी अगवानी।
कहकर सारी दिखलादी,
जो थी उनको समझानी।
-नवीन माथुर पंचोली













