
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थिति निबन्धनी ।
विषयवती= विषय वाली; प्रवृत्ति:= प्रवृत्ति; उत्पन्ना= उत्पन्न होकर वह; वा= भी; मनस:= मन की; स्थितिनिबन्धनी= स्थिति को बाँधने वाली हो जाती है ।
अनुवाद– अथवा विषय वाली प्रवृत्तियाँ {गन्ध, रूप, रस, शब्द, स्पर्श आदि} उत्पन्न होकर मन की स्थिति को बाँधने वाली हो जाती हैं ।
व्याख्या– दूषित मन कभी स्थिर नहीं रहता । जब तक चित्त में तरंगे उठती हैं वह कभी शान्त नहीं हो सकता ।
शुद्ध निर्मल चित्त ही शान्त होता है जिसके उपाय पतंजलि ने ऊपर बताएं हैं ।
चित्त में उठी तरंगों का नाम ही मन है । मन के स्थिर एवं शान्त होने का अर्थ है चित्त में तरंगे अब नहीं उठ रही हैं । इस स्थिति को ही समाधि अवस्था कहते हैं ।
मुक्ति की प्रक्रिया इसके बाद आरम्भ होती है । सूत्र 35 से 40 तक मन के स्थिर होने के और भी उपाय बताए गए हैं ।
इस सूत्र में कहा गया है कि मन को बाहरी विषयों से हटाकर जब भीतर की ओर मोड़ दिया जाता है तो उसे दिव्य विषयों का साक्षात् होना आरम्भ हो जाता है ।
यह सब ध्यान की अवस्था में होता है । ज्यों-ज्यों मन का प्रवाह भीतर की ओर होता है साधक को कई अतीन्द्रिय अनुभव होने आरम्भ हो जाते हैं ।
इन दिव्य विषयों का अनुभव करने वाली वृत्ति को ‘विषयवती प्रवृत्ति’ कहते हैं ।
इसमें साधक को कभी विभिन्न प्रकार के वाद्यो के {ध्वनि} शब्द सुनाई पड़ते हैं विभिन्न प्रकार की आवाजें सुनाई देती हैं कभी किसी साधु, महात्मा, धूनी तथा अपने इष्टदेव के रूप में दर्शन भी होते हैं, कभी विभिन्न प्रकार के स्वाद आने लगते हैं, कभी विभिन्न प्रकार की गंध आने लगती है, कभी-कभी सूर्य, चन्द्रमा, सितारे, दीप, मणि आदि का प्रकाश दिखाई देता है ।
इन सब दिव्य अनुभवों से साधक की रुचि बढ़ती है, उसका विश्वास दृढ़ हो जाता है कि उसकी साधना ठीक से चल रही है । यह एक नई दुनिया में प्रवेश है जिसे ध्यान की दुनिया कहते हैं ।
इस दुनिया में प्रवेश करने के बाद जहाँ-जहाँ गुरु कहे वहाँ-वहाँ ध्यान को केंद्रित करने से ये चीजे जब चाहें देखी, सुनी जा सकती हैं । ये सब मन को स्थिर करने वाली हैं जिससे आत्म चिन्तन के अभ्यास में सहायता मिलती है । ये अनुभव ‘धारणा’ काल के हैं । इसके बाद ध्यान और समाधि की स्थिति आती है ।।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













