
यथाऽभिमतध्यानाद्वा ।
यथाऽभिमतध्यानात्= जिसको जो अभिमत हो उसके ध्यान से; वा= भी; {मन स्थिर हो जाता है} ।
अनुवाद– अभीष्ट विषय के ध्यान से भी मन स्थिर होता है ।
व्याख्या– उपर्युक्त सूत्र में पतंजलि ने मन को स्थिर करने के अनेक उपाय बताएँ हैं । जो उपाय जिसकी रुचि के अनुकूल हो उसे उसी उपाय द्वारा मन को स्थिर करना चाहिए । इस सूत्र में महर्षि कहते हैं कि इसके अलावा भी जिन्हें ये साधन रुचिकर न लगे वे अपनी पसंद के विषयों में ध्यान करके मन को स्थिर कर सकते हैं ।
जैसे अपने इष्ट देवता का ध्यान राम, कृष्ण, शिव, गणेश, हनुमान तथा अन्य देवता नाभि, स्वाँस, हृदय, भृकुटि आदि पर ध्यान अपने गुरु की प्रतिमा अथवा चित्र पर ध्यान, संतों के चित्रों पर ध्यान आदि ।
इसमें मुख्य बात है मन का स्थिर होना । ये सब माध्यम हैं । माध्यम अपनी रुचि के अनुसार कुछ भी चुना जा सकता है । यही एक तत्व का अभ्यास है ।
इसमें कई चीजें एक साथ नहीं मिलानी चाहिए वरना ध्यान होगा ही नही । ईश्वर को सर्वत्र मानकर कहीं भी ध्यान को केंद्रित किया जा सकता है ।
सूत्र 33 से 39 तक के कर्म चित्त शोधन के लिए हैं जिनसे चित्त निर्मल होकर स्थिर हो जाता है तथा आगे का मार्ग खुल जाता है । ये सब साधन प्रारम्भिक हैं । इन्हें शोधन कर्म कहते हैं । ये ईश्वर भक्ति तथा योग सिद्धि के लिए पात्रता प्रदान करते हैं । शुद्ध एवं सात्विक कर्म चित्त की दूषित वृत्तियों का शोधन करते हैं । दृढ़ निष्ठा से करने पर ही वांछित उपलब्धि होती है किंतु होना चाहिए एक तत्व का अभ्यास ।
{ध्यान के चित्र को} बार-बार पलटते रहने से लाभ नहीं होता ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













