
अगर तू नहीं मिलेगा, तो ऐसा थोड़े हैं कि मर जाएंगे हम,
हाँ, ये सच है… तेरे इश्क़ में उन गलियों से कई बार गुज़रे हैं हम।
जहाँ तेरी यादों की ख़ुशबू अब भी बसी है,
वहीं हर मोड़ पे ठहर कर, खुद से बिखरे हैं हम।
वो मोड़, वो दर, वो रास्ते
सब अब भी पहचानते हैं,
जहाँ तेरे साथ कभी हंसते थे,
वहीं अब ख़ामोश ठहरे हैं हम।
हाँ, ये भी सच है आज भी उन्हीं जगहों पर जाता हूँ,
जहाँ तेरे संग वक़्त मुस्कुराया करता था।
कुछ यादें चुन लाता हूँ हर बार,
मगर तेरी ख़ुशबू… नहीं ला पाता हूँ।
अगर तू जा ही रही थी…
तू है भी या नहीं अब मालूम नहीं,
मगर तेरी यादें आज भी बहुत आती हैं।
हर शाम वही सन्नाटा, वही पुराना रास्ता,
जहाँ तेरी हँसी की गूँज अब भी सुनाई पड़ती है।
कभी सोचता हूँ अगर तू जा ही रही थी,
तो अपनी यादें भी साथ ले जाती।
कम-से-कम ये दिल हर रोज़
तेरे नाम की तन्हाई तो नहीं गिनता।
अब ना ख़त लिखे जाते हैं,
ना कोई आवाज़ पहुँचती है तेरी ओर,
बस एक सवाल रह गया है
क्या तू सच में थी… या सिर्फ़ मेरी ख़्वाहिशों का शोर था?
आर एस लॉस्टम













