
ये सन्नाटे
जब जुबां साथ नहीं देती है,
मन के भाव उमड़ते हैं तब,
सन्नाटे बोलते हैं।
आंसुओं को पलकें रोक लेती हैं,
बंद आंखें बहुत कुछ
राज खोल देती हैं,
तब सन्नाटे बोलते हैं।
बरसों साथ निभाकर भी
यदि बोलने के शब्दों को
बोलने के पहले तौलना होता है,
तब सन्नाटे बोलते हैं।
यह अजीब से सन्नाटे जब बोलते हैं,
तो बड़े-बड़े बोलने वाले भी
सर झुका कर खड़े होते हैं।
सन्नाटों की जुबान बड़ी कठिन होती है,
मन के जख्मों की रिसन इनमें बसी होती है।
कितना अजीब है ना?
ये सन्नाटे भी बोलते हैं!!!!
सुलेखा चटर्जी













