
चल-अचल सब पल में छीना,
भ्रमित मन भ्रम में ही जीना।
सकल चराचर जग का धन था,
जग ने ही वापस ले लीना॥
भ्रम के जाल जब टूट गए,
बंधन सारे छूट गए।
सत्य हुआ तब दृष्टि में प्रकट,
मुक्ति मिली जब मूल गए॥
राह कठिन थी पनघट वाली,
बैरी ने रस्ता भी छीना।
पग-पग पर विष घोला उसने,
फिर भी न मन का नाता छीना॥
बैरन के जा बना पियाब,
पीर पिराई न उसने देखा।
नेत्र भरे थे प्रश्नों से पर,
उत्तर कोई न उसने देखा।
आर एस लॉस्टम













