Uncategorized
Trending

अंतर्मन का युद्ध


नाकामयाब हूँ मैं, व्यर्थ समझता हूँ खुदको,

दुनिया के ताने सुन–सुन रोता हूँ खुदको।

उस बंद कमरे की बातें मैं ही समझता हूँ,

क्यूँ हुआ मैं बरबाद ये भी जानता हूँ।

है मेरे भी कुछ सपने नहीं मैं पूरा करना चाहता हूं ,

थक चुका हूँ मन-ही-मन अब बस शांत रहना चाहता हूँ।

कैसा इंसान हूँ मैं, ये सब सारी बातें बस खुद तक रखना चाहता हूँ,

मुझे पता है, हां है, जिम्मेदारियों का एहसास मुझको ।

हां ,किसी को नहीं पता पर प्रयास कर रहा हूँ ढकेल रहा हूँ खुदको,

पढ़ रहा हूँ, नईं बातें गढ़ रहा हूँ।

विद्यार्थी हूँ प्रयास, प्रयत्न, संघर्ष ही कर रहा हूँ,

पर समझो कभी व्यथा भी मेरी—कितना अकेला हो गया हूँ।

मुझे भी लेने दो खूली—हवा में सांस, बेफिक्री की लेने दो।

लगता है सबको की नहीं पता मुझे फर्क

पर, यही सारी बातें दिनभर सोचता हूँ।

रात भर बुनता हूँ सपने ,बनाता हूँ अपने लिए हर रास्ते,

जब सुबह उठता हूँ तो ,खुदको वहीं कहीं गुम पाता हूँ,

लगता है कभी-कभी रास्ते पाँव से आगे भाग रहे ,

पर फिर खुदको संभाल लेता हूँ ।

जानता हूं नाकामयाब हूं मैं व्यर्थ समझता हूं खुदको,

दुनिया के ताने सुन सुन रोता हूं खुदको।

अधिष्ठा दास
कक्षा 11वीं
विकासखंड बसना
जिला महासमुंद छत्तीसगढ़

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *