
मुट्ठी भर आकाश और आसमान से सपने,
समंदर भर ख़्याल,और अरमान बहुत ही अपने।।
दरियां के जल सा अनुभव,और आचमन अंजुलि सा,
कैसे करू नजारा,दुनियाँ की उलझनों का।।
तुम समझे नही हो शायद,मेरे मन की या मनमानी,
सुनाना चाहता हूँ ,दिल की,बिन कहे ही मैं कहानी।।
तुम गौर फरमाना आईने मे, जो अक्स नज़र आएगा,
किरदार होगा मेरा ही, और तुम्हे अपना नज़र आएगा।।
ये सुनामी ख़्यालों की, आकर के जख़्म करेंगी ,
तुम कुरेदोगें भी जो न ,जख़्म हरे ही सब रखेंगी।।
कहते हो मुट्ठीभर ही,आकाश तुम्हारा सरल है,
पर पीकर तो जरा देखो,कितना तीखा ये गरल है।।
संदीप शर्मा सरल।।
देहरादून उत्तराखंड ।।













