
तत्र शब्दार्थ ज्ञान विकल्पै: संकीर्णा सवितर्का समापत्ति ।
तत्र= उसमें; शब्दार्थज्ञानविकल्पैः= शब्द, अर्थ, ज्ञान– इन तीनों के विकल्पों से; संकीर्णा= संकीर्ण– मिली हुई; समापत्ति:= समाधि; सवितर्का= सवितर्क है ।
अनुवाद– जहां शब्द अर्थ और ज्ञान अभिन्न ज्ञात हो वह ‘सवितर्क समाधि’ है ।
व्याख्या– उपर्युक्त सूत्र में वर्णित ‘सम्प्रज्ञात समाधि’ के चार चरण हैं । सवितर्क {सविकल्प} निर्वितर्क {निर्विकल्प} सविचार, निर्विचार, आनन्दानुगत तथा अस्मितानुगत जो वितर्क, विचार, आनन्द तथा अस्मिता के चार चरणों में पूर्ण होती है जिसका वर्णन पहले सूत्र १७ में किया गया है । इस सूत्र में ‘सवितर्क समाधि’ का और वर्णन किया गया है कि इस समाधि में मन और इंद्रियों द्वारा स्थूल तथा सूक्ष्म विषय ग्रहण करने में आते हैं । जब किसी स्थूल विषयों का ध्यान किया जाता है तो उससे होने वाले अनुभव में उसके नाम रूप तथा ज्ञान के विकल्पों का मिश्रण रहता है । तीनों की एक ही साथ में चित्त में प्रतीति होती है । इसलिए इस समाधि को ‘सवितर्क’ अथवा ‘सविकल्प समाधि’ कहते हैं । इसमें मन तदाकार तो हो जाता है किन्तु उसमें शब्द, अर्थ और ज्ञान का विकल्प बना रहता है अर्थात् तीनों एक साथ ध्यान में आते हैं ।
इसमें भी मन की चंचलता थोड़ी मात्रा में रहती है कि एक पर ध्यान जमाने पर तीनों बातें एक साथ ध्यान में आ जाती हैं यह तीनों अभिन्न ज्ञात होती हैं यह नीचे दर्जे की है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













