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तारों की ख्वाहिश


अब रहने दे मुझे आज़माना,
वक़्त ने क्या सितम कम किए हैं?
तुम भी चले आए करने पंचनामा
अब कहने दे मुझे
तेरे कर्मों का हर कारनामा…

ये वक़्त का दरिया डूबा देगा पूरे जहाँ को,
छोड़ रहने भी दे बादलों में तीर चलाना।
समंदर की प्यास ठीक नहीं होती, जनाब,
कहीं डुबो न दे
तेरा अपना ही आशियाना।

चाँद तारों की ख्वाहिशें भी रखते हो,
और जुगनुओं के पीछे भी भागते हो…
लगता है जैसे तुमने पक्षियों से
सूरज छू लेने की कोई
अजीब-सी शर्त लगाई है।

परिंदों के शायद घर नहीं होते,
आसमान ही उनका जन्मजात ठिकाना है।
उड़ते देखा है मैंने उन्हें नीले विस्तार में,
पर अक्सर सोचा है
क्या बहती हवाओं के भी कभी पर होते हैं?
कभी देखा नहीं
पंखों को यूँ खुलकर मुस्कुराते हुए

आर एस लॉस्टम

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