
स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवाऽर्थमात्रनिर्भाशा निर्वितर्का ।
स्मृतिपरिशुद्धौ= {शब्द और प्रतीति की} स्मृति के भली भाँति लुप्त हो जाने पर; स्वरूपशून्या= अपने स्वरूप में शून्य हुई के; इव= सदृश; अर्थमात्रनिर्भाशा= केवल ध्येय मात्र के स्वरूप को प्रत्यक्ष कराने वाली {चित्त की स्थिति ही}; निर्वितर्का= निर्वितर्क समाधि है ।
अनुवाद– स्मृति के शुद्ध होने पर स्वरूप से रहित अर्थ मात्रा को प्रकाश करने वाली चित्त की स्थिति ही ‘निर्वितर्क समाधि’ है ।
व्याख्या– सवितर्क समाधि में स्थूल विषय के नाम, रूप तथा ज्ञान का एक साथ स्मरण होता है । तीनों अभिन्न ज्ञात होते हैं किंतु इसे अधिक सूक्ष्म किए जाने पर शब्द, अर्थ और ज्ञान की अलग-अलग प्रतीति होती है । एक साथ तीनों की प्रतीति नहीं होती इसे निर्वितर्क समाधि कहते हैं ।
इसी का दूसरा नाम ‘निर्विकल्प समाधि’ भी है । इसमें दूसरा विकल्प रहता ही नहीं । यही स्मृति परिशुद्धि है यही ऊंची स्थित है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













